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1.9 किलो के नवजात को मिली नई जिंदगी, एम्स पटना में महाधमनी की गंभीर रुकावट का सफल इलाज

समय से पहले जन्मे बच्चे की हालत थी बेहद नाजुक, किडनी फेलियर का भी था खतरा, कैथेटर से बलून एंजियोप्लास्टी कर खोली गई महाधमनी की रुकावट

फुलवारी शरीफ, अजीत: एम्स पटना के चिकित्सकों ने महज 1.9 किलो वजन वाले समय से पहले जन्मे नवजात का जटिल और चुनौतीपूर्ण उपचार कर उसे नई जिंदगी दी है. नवजात की महाधमनी में गंभीर रुकावट थी, जिसके कारण शरीर के निचले हिस्से में रक्त का प्रवाह बुरी तरह प्रभावित हो गया था. गंभीर स्थिति के साथ बच्चे को सांस लेने में परेशानी, हृदय संबंधी जटिलताओं और किडनी में गंभीर चोट जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ा. कई सप्ताह तक एनआईसीयू में गहन उपचार और निगरानी के बाद बच्चा चिकित्सकीय रूप से स्थिर हुआ और स्वस्थ अवस्था में उसे अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया.

बच्चे की हालत जन्म के बाद से ही बेहद गंभीर थी. महाधमनी में रुकावट के कारण शरीर के निचले हिस्से और किडनी तक पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं पहुंच पा रहा था. इसका सीधा असर किडनी की कार्यक्षमता पर पड़ा और बच्चे में पेशाब की मात्रा काफी कम हो गई. स्थिति गंभीर होने के बाद उसे पेरिटोनियल डायलिसिस की आवश्यकता पड़ी. खास बात यह रही कि बच्चे की बेहद कम उम्र और कम वजन के बावजूद एनआईसीयू में ही डायलिसिस की सुविधा उपलब्ध कराकर उपचार जारी रखा गया.

लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहा नवजात

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बच्चे को सांस लेने में भी गंभीर परेशानी थी. उसकी नाजुक स्थिति को देखते हुए उसे लंबे समय तक नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट में वेंटिलेटर पर रखा गया. इस दौरान नियोनेटोलॉजी टीम ने उसके श्वसन, हृदय की स्थिति, किडनी की कार्यक्षमता और मेटाबॉलिक स्तर की लगातार निगरानी की. कम वजन और गंभीर बीमारी के कारण उपचार का प्रत्येक चरण चिकित्सकों के लिए चुनौतीपूर्ण था.

छोटी रक्त वाहिकाओं तक पहुंचना बड़ी चुनौती

बच्चे का वजन सिर्फ 1.9 किलो होने के कारण उसकी रक्त वाहिकाएं बेहद छोटी थीं. ऐसे में कैथेटर के जरिए महाधमनी तक पहुंच बनाना तकनीकी रूप से काफी कठिन था. इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विभाग के डॉ. सूर्यनंदन प्रसाद ने अल्ट्रासाउंड की सहायता से अत्यंत सावधानीपूर्वक बच्चे की रक्त वाहिका तक पहुंच बनाई. इसके बाद कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अनुपम भंभानी के नेतृत्व में चिकित्सकों की टीम ने कैथेटर के माध्यम से बलून एंजियोप्लास्टी की.

बलून एंजियोप्लास्टी से खुली महाधमनी की रुकावट

कैथेटर आधारित प्रक्रिया के दौरान महाधमनी में मौजूद गंभीर रुकावट को बलून की मदद से खोला गया. प्रक्रिया सफल रहने के बाद शरीर के निचले हिस्से में रक्त का प्रवाह बेहतर हुआ. रक्त प्रवाह में सुधार के साथ बच्चे की किडनी तक भी पर्याप्त रक्त पहुंचने लगा और धीरे-धीरे पेशाब की मात्रा बढ़ने लगी. इसके बाद किडनी की कार्यक्षमता में भी सुधार दिखाई देने लगा.

एनआईसीयू में कई सप्ताह तक चला उपचार

प्रक्रिया के बाद भी चिकित्सकों ने बच्चे को लंबे समय तक गहन निगरानी में रखा. आवश्यकता के अनुसार पेरिटोनियल डायलिसिस जारी रखा गया, जिसकी निगरानी डॉ. अर्नब घोरुई ने की. नियोनेटोलॉजी विभाग के चिकित्सकों और रेजिडेंट डॉक्टरों की टीम ने बच्चे की स्थिति पर लगातार नजर रखी. सांस, हृदय, किडनी और मेटाबॉलिक स्तर में होने वाले छोटे से छोटे बदलाव की भी लगातार निगरानी की गई.

उपचार के दौरान नियोनेटोलॉजी विभाग के डॉ. रिची दलई और डॉ. केशव कुमार पाठक तथा एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. अभ्युदय ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. कई सप्ताह की गहन चिकित्सा और निगरानी के बाद बच्चे की स्थिति में लगातार सुधार हुआ. उसकी किडनी की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय सुधार आया और सामान्य स्वास्थ्य भी बेहतर होता गया.

बहु-विभागीय टीम के समन्वय से मिली सफलता

नियोनेटोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. भबेश कांत चौधरी ने कहा कि नवजात की स्थिति बेहद गंभीर थी. ऐसे मामले में अलग-अलग विशेषज्ञ विभागों के बीच बेहतर समन्वय और लंबे समय तक गहन देखभाल बेहद जरूरी होती है. टीम के सामूहिक प्रयास से बच्चे की स्थिति को नियंत्रित करने और उसे स्वस्थ अवस्था तक पहुंचाने में सफलता मिली.

कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अनुपम भमबानी

ने बताया कि 1.9 किलो वजन वाले नवजात में कैथेटर आधारित प्रक्रिया करना तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण था. बच्चे की रक्त वाहिकाएं बहुत छोटी थीं और उसकी स्थिति भी गंभीर थी. सफल बलून एंजियोप्लास्टी के बाद महाधमनी में रक्त प्रवाह बेहतर हुआ, जिसका बच्चे की रिकवरी पर महत्वपूर्ण सकारात्मक असर पड़ा.

एम्स पटना के कार्यकारी निदेशक एवं सीईओ प्रो. (ब्रिगेडियर) डॉ. राजू अग्रवाल ने नवजात के सफल उपचार के लिए पूरी टीम को बधाई दी. उन्होंने कहा कि बेहद कम वजन और गंभीर स्थिति वाले नवजात का सफल उपचार एम्स पटना की विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं, टीमवर्क और बहु-विषयक चिकित्सा व्यवस्था को दर्शाता है.

कई सप्ताह तक चले गहन उपचार के बाद 1.9 किलो का यह नवजात अब चिकित्सकीय रूप से स्थिर है और स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया. बच्चे की हालत में सुधार के बाद उसके माता-पिता के चेहरे पर भी राहत और खुशी लौट आई. चिकित्सकों के अनुसार यह सफलता नियोनेटोलॉजी, कार्डियोलॉजी, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी और एनेस्थीसिया विभाग के चिकित्सकों के साथ एनआईसीयू की नर्सिंग और सपोर्ट टीम के सामूहिक प्रयास का परिणाम है.

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