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मस्तिष्क और कैंसर पर रिसर्च के लिए वैश्विक मंच पर चमक रहे पटना के प्रतिभाशाली युवा वैज्ञानिक दंपति.

फुलवारी शरीफ, अजीत कुमार: बिहार की राजधानी पटना से जुड़े एक युवा वैज्ञानिक दंपति ने अंतरराष्ट्रीय विज्ञान जगत में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल कर राज्य और देश का नाम रोशन किया है. दोनों वैज्ञानिकों को अपने-अपने शोध क्षेत्रों में प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं. न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में कार्यरत डॉ. मुकेश कुमार को पार्किंसन रोग पर उनके शोध के लिए माइकल जे. फॉक्स फाउंडेशन की प्रतिष्ठित डिस्कवरी फेलोशिप प्रदान की गई है, जबकि डॉ. अंजलि यादव को प्रोस्टेट कैंसर पर उनके महत्वपूर्ण शोध कार्य के लिए अमेरिका की यूरोलॉजी केयर फाउंडेशन द्वारा सम्मानित किया गया है. उनकी यह उपलब्धि बिहार सहित पूरे देश के लिए गौरव और प्रेरणा का विषय बन गई है.
डॉ. मुकेश कुमार मूल रूप से पटना के फुलवारी शरीफ स्थित ईसोपुर गांव के निवासी हैं. उनके पिता सत्येंद्र प्रसाद एक छोटे व्यवसायी रहे हैं, जबकि माता मुंदरी देवी गृहिणी हैं. उनके छोटे भाई कई वर्षों से जापान में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में कार्यरत हैं. मुकेश की प्रारंभिक शिक्षा ईसोपुर और फुलवारी शरीफ के विद्यालयों में हुई. इसके बाद उन्होंने आईआईटी खड़गपुर से उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च से पीएचडी पूरी की.
पीएचडी के दौरान किए गए उत्कृष्ट शोध कार्य के लिए वर्ष 2020 में उन्हें नोबेल पुरस्कार विजेता वेंकटरमण रामकृष्णन द्वारा एम्स दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में इंस्पायरिंग साइंस अवार्ड से सम्मानित किया गया था. वर्तमान में वे अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में मस्तिष्क संबंधी रोगों पर शोध कर रहे हैं. आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस फेलोशिप के अंतर्गत उनके शोध कार्य के लिए लगभग 4.5 करोड़ रुपये की सहायता राशि प्रदान की जाएगी.
माइकल जे. फॉक्स फाउंडेशन की डिस्कवरी फेलोशिप एक अत्यंत प्रतिस्पर्धी अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य पार्किंसन रोग अनुसंधान के क्षेत्र में नई पीढ़ी के वैज्ञानिकों को स्वतंत्र शोध के लिए प्रोत्साहित करना है. वर्ष 2026 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम के अंतर्गत दुनिया भर से केवल 23 शोध परियोजनाओं का चयन किया गया है, जिनमें डॉ. मुकेश कुमार की परियोजना भी शामिल है. उनके शोध का मुख्य विषय मस्तिष्क में वसा चयापचय और पार्किंसन रोग के बीच संबंधों को समझना है. यह शोध कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पादन और तंत्रिका कोशिकाओं की कार्यप्रणाली के बीच संबंधों को उजागर करने का प्रयास करेगा, जिससे भविष्य में तंत्रिका संबंधी रोगों की बेहतर समझ विकसित हो सकेगी.
वहीं, डॉ. अंजलि यादव ने प्रोस्टेट कैंसर अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है. उनका पारिवारिक संबंध उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से है, जबकि उनका परिवार वर्तमान में चंडीगढ़ में निवास करता है. उनके पिता रामसागर यादव भारतीय वायुसेना में अधिकारी रह चुके हैं तथा माता लीला देवी गृहिणी हैं. उनकी बहन अर्चना यादव भारतीय नौसेना में सर्जन कमांडर के पद पर कार्यरत हैं.
डॉ. अंजलि यादव की शादी वर्ष 2019 में पटना निवासी डॉ. मुकेश कुमार से गोरखपुर में हुई थी. उनकी प्रारंभिक शिक्षा चंडीगढ़ में हुई और बाद में उन्होंने आईआईटी कानपुर से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की. प्रोस्टेट कैंसर पर किए गए शोध कार्य के लिए उन्हें वर्ष 2022 में ग्लोबल स्कॉलर अवार्ड भी मिल चुका है. इस उपलब्धि के तहत उन्हें अमेरिका में अपने शोध कार्य को प्रस्तुत करने का अवसर प्राप्त हुआ था.
अब एक बार फिर डॉ. अंजलि यादव को अमेरिका की यूरोलॉजी केयर फाउंडेशन द्वारा रिसर्च स्कॉलर अवार्ड से सम्मानित किया गया है. यह फाउंडेशन अमेरिकन यूरोलॉजिकल एसोसिएशन की आधिकारिक शोध इकाई है. इसके तहत युवा वैज्ञानिकों को प्रोस्टेट कैंसर जैसे गंभीर रोगों पर उन्नत शोध कार्य के लिए दो वर्षों तक आर्थिक और शैक्षणिक सहयोग प्रदान किया जाता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि डॉ. मुकेश कुमार और डॉ. अंजलि यादव की यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि बिहार और पूर्वांचल की पृष्ठभूमि से आने वाले युवा वैज्ञानिक आज वैश्विक विज्ञान मंच पर अपनी मजबूत पहचान बना रहे हैं. एक ओर डॉ. मुकेश पार्किंसन रोग और मस्तिष्क संबंधी जटिल जैविक प्रक्रियाओं को समझने में जुटे हैं, तो दूसरी ओर डॉ. अंजलि प्रोस्टेट कैंसर के उपचार और रोकथाम से जुड़ी नई संभावनाओं की खोज में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं.
दोनों वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि उन युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं और उन्हें साकार करने के लिए निरंतर मेहनत करते हैं. शिक्षा और शोध जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि ऐसी सफलताएं केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं होतीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों में विज्ञान और अनुसंधान के प्रति विश्वास और उत्साह भी पैदा करती हैं. पटना से निकलकर अंतरराष्ट्रीय संस्थानों तक पहुंचने वाला यह वैज्ञानिक दंपति आज देश के युवाओं के लिए एक प्रेरक मिसाल बन चुका है.

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