रांची विश्वविद्यालय में मौलाना आज़ाद पर संगोष्ठी, कुलपति ने शिक्षा और राष्ट्रीय एकता पर रखा दृष्टिकोण
पटना/रांची.(अजीत )रांची विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सोमवार को “मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का जीवन और सेवाएँ” विषय पर एक प्रभावशाली संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस शैक्षणिक कार्यक्रम में शिक्षाविदों, शोधार्थियों, साहित्यकारों और बड़ी संख्या में छात्रों ने भाग लेकर इसे सफल बनाया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रांची विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. धर्मेंद्र कुमार सिंह थे। अपने संबोधन में उन्होंने उर्दू भाषा के सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उर्दू केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि भारत की साझा विरासत और भाईचारे की पहचान है।
कुलपति ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के बहुआयामी योगदान, स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी अहम भूमिका और स्वतंत्र भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री के रूप में उनके दूरदर्शी शैक्षिक दृष्टिकोण का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का भविष्य एक शिक्षित, जागरूक और प्रतिभाशाली युवा पीढ़ी पर निर्भर करता है।
कार्यक्रम में उर्दू विभाग के शिक्षकों और शोधार्थियों ने मौलाना आज़ाद की बौद्धिक विरासत, साहित्यिक विचारों, पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके योगदान और राष्ट्रीय एकता पर उनके प्रभाव से जुड़े शोधपत्र प्रस्तुत किए। प्रश्नोत्तर सत्र ने संगोष्ठी को और अधिक सारगर्भित बनाया।

अंजुमन-ए-इस्लामिया के अध्यक्ष मुख्तार अंसारी ने मौलाना आज़ाद द्वारा स्थापित मदरसा इस्लामिया के जीर्णोद्धार और “मौलाना आज़ाद कॉलेज” के विकास पर विशेष जोर देने की बात कही। वहीं वक्फ बोर्ड सदस्य अबरार अहमद ने राष्ट्रीय एकता और द्विराष्ट्र सिद्धांत के विरोध पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया।
डॉ. सुजाता सिंह ने अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता में मौलाना आज़ाद के विचारों के प्रभाव पर एक विस्तृत शोधपत्र प्रस्तुत किया, जिसे प्रतिभागियों ने सराहा।
इस अवसर पर कुलपति प्रो. सिंह ने डॉ. मुहम्मद साबिर के उपन्यास “दीवार के इस्तपार” का औपचारिक लोकार्पण भी किया।
संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के कई विभागाध्यक्ष, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न कॉलेजों के प्राध्यापक भी उपस्थित थे। सैकड़ों छात्रों और शोधार्थियों की भागीदारी ने कार्यक्रम को एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक संगम का रूप दे दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. रिज़वान अली ने की, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. एजाज अहमद ने प्रस्तुत किया। संगोष्ठी का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।



