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पेठिया बाजार की बड़ी देवी जी फुलवारी शरीफ की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा

बैलगाड़ी वालों की छोड़ी ईंटों से बनी बड़ी देवी, कंधों पर सवार होकर होती है विदाई

सौ साल पुरानी परंपरा आज भी कायम, पालकी में कहार के कांधे पर मां की विदाई देखने उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब

फुलवारी शरीफ, अजीत:

बदलते शहर के बीच फुलवारी शरीफ के पेठिया बाजार में मां दुर्गा का ऐसा मंदिर है, जिसकी आस्था और परंपरा का इतिहास पुराना है. प्रखंड मुख्यालय के लगभग सामने भीतरी सड़क पर स्थित इस मंदिर की बड़ी देवी जी के रूप में पहचान है. स्थानीय लोगों के अनुसार, कभी इस रास्ते से गुजरने वाली बैलगाड़ियों से गिरने वाली ईंटों को धीरे-धीरे एकत्र किया गया और इसी से धार्मिक स्थल का स्वरूप विकसित हुआ. समय के साथ यहां मंदिर बना और बड़ी देवी जी फुलवारी शरीफ की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गयीं. कहां जाता है की फुलवारी शरीफ और उसके आसपास के करीब 20 से 25 किलोमीटर के दायरे में फैला कई गांव में अनगिनत ईंट भट्ठे का कारोबार चलता था . पटना शहर का निर्माण और बड़ी-बड़ी इमारत राजधानी के रूप में ब्रिटिश काल में बड़े-बड़े भवन निर्माण के लिए इसी इलाके से बैलगाड़ियों पर दिन रात ईंट ढोकर शहरों में पहुंचाया जाता था आने जाने के दौरान ईंट जहाँ तहां गिर जाता था,उन ईंटों को लोग इकट्ठा करके रखने लगे जिससे यहां मंदिर का निर्माण हुआ

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बड़ी देवी जी की पूजा से जुड़ी परंपरा करीब सौ वर्षों से चली आ रही बतायी जाती है. मंदिर का स्वरूप समय के साथ बदलता गया, बाजार और शहर का विस्तार हुआ, लेकिन मां की पूजा और विसर्जन की पुरानी परंपरा आज भी कायम है. नवरात्र के दिनों में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है, जबकि विजयादशमी के बाद होने वाली मां की विदाई इस परंपरा का सबसे भावुक और आकर्षक दृश्य बन जाती है.

फुलवारी शरीफ के पेठिया बाजार स्थित दुर्गा स्थान की बड़ी देवी जी की गौरवशाली गाथा स्वतंत्रता संग्राम के दौर, जनसहयोग और लोक आस्था से जुड़ी है. स्थानीय इतिहास के अनुसार, स्वतंत्रता सेनानी मोतीलाल ने वर्ष 1925 में यहां दुर्गापूजा की शुरुआत की थी. उस समय मंदिर का स्वरूप छोटा था और पूजा सीमित संसाधनों के बीच होती थी. आज करीब एक सदी बाद यह स्थान फुलवारी शरीफ की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन चुका है. यहां की सबसे विशिष्ट परंपरा मां दुर्गा की प्रतिमा को विसर्जन के लिए पालकी में विराजमान कर दर्जनों कहारों के कंधों पर नगर भ्रमण कराते हुए सरोवर तक ले जाना है.

आज के दौर में अधिकांश पूजा समितियां प्रतिमाओं को वाहनों से विसर्जन स्थल तक ले जाती हैं, लेकिन फुलवारी शरीफ की बड़ी देवी जी को आज भी पालकी में विराजमान कर दर्जनों कहार अपने कंधों पर उठाते हैं. पालकी को लेकर श्रद्धालुओं के बीच से गुजरती शोभायात्रा नगर भ्रमण करते हुए सरोवर तट तक पहुंचती है. मां की विदाई देखने के लिए फुलवारी शरीफ की सड़कों पर हजारों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है.

बड़ी देवी जी की पालकी निकलते ही घरों की छतों, दरवाजों और रास्ते के दोनों ओर खड़े लोग पुष्प वर्षा कर मां को विदाई देते हैं. इस दौरान वातावरण भक्तिमय हो जाता है. जय माता दी और जय काली के जयघोष से पूरा इलाका गूंज उठता है. महिलाएं आरती और पूजा-अर्चना करते हुए मां की विदाई में भावुक हो जाती हैं. श्रद्धालुओं की आंखें नम हो जाती हैं. स्थानीय मान्यता है कि विदाई के समय मां की आंखें भी नम हो जाती हैं.

पालकी यात्रा के रास्ते में श्रद्धालु घंटों पहले से जमा हो जाते हैं. बड़ी देवी जी के दर्शन और अंतिम विदाई के लिए आसपास के मोहल्लों के अलावा दूर-दराज से भी लोग पहुंचते हैं. मां की पालकी के साथ चलने वाली भीड़ इतनी अधिक होती है कि पूरे मार्ग पर विशेष सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ती है. कई थानों की पुलिस के साथ बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती की जाती है, ताकि श्रद्धालुओं की भीड़ और यातायात को नियंत्रित किया जा सके.

बड़ी देवी जी का पूजा आयोजन भव्य रूप ले चुका है. पूजा समिति के प्रमुख सदस्य आनंद प्रसाद गुप्ता, मुन्ना लाहकार और पंचम पंडित के अनुसार, मंदिर के पूरब और पश्चिम दोनों ओर करीब पांच सौ मीटर के दायरे में आकर्षक सजावट की जाती है. सप्तमी से लेकर विसर्जन तक आसपास के गांवों और दूर-दराज के इलाकों से श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. पूजा के अलग-अलग दिनों में खीर, पुआ, हलवा और मिठाइयों का भोग लगाया जाता है.
नवमी के दिन विशाल कन्या पूजन का आयोजन होता है. छोटी-छोटी बच्चियों को मंदिर परिसर में बैठाकर चुनरी पहनाई जाती है, उनके पैरों में गुलाबी रंग लगाया जाता है और उन्हें भोजन कराया जाता है. वर्षों से चली आ रही यह परंपरा पूजा के धार्मिक और सामाजिक स्वरूप को दर्शाती है.
कभी दस दिनों तक होती थी रामलीला
बड़ी देवी जी के पूजा आयोजन का एक खास आकर्षण रामलीला भी हुआ करता था. पहले यहां दस दिनों तक रामलीला मंडली मंच सजाकर धार्मिक प्रसंगों का मंचन करती थी. दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से आने वाले श्रद्धालुओं के पास रात में लौटने का साधन नहीं होता था. उनके ठहराव और मनोरंजन के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे. समय के साथ ये आयोजन धीरे-धीरे बंद हो गए, लेकिन उनकी स्मृतियां आज भी पुरानी पीढ़ी के लोगों के बीच जीवित हैं.

बड़ी देवी जी का इतिहास केवल मंदिर और पूजा तक सीमित नहीं है. इससे फुलवारी शरीफ के पुराने बाजार, बैलगाड़ियों के दौर और स्थानीय सामाजिक जीवन की स्मृतियां भी जुड़ी हैं. बैलगाड़ी से गिरने वाली ईंटों से शुरू हुई आस्था के केंद्र के बारे में बुजुर्गों की बतायी कहानी आज भी लोगों की जुबान पर है. पीढ़ियां बदल गयीं, शहर का स्वरूप बदल गया, आवागमन के साधन बदल गये, लेकिन मां की पालकी में विदाई की परंपरा नहीं बदली.

यही वजह है कि पेठिया बाजार की बड़ी देवी जी फुलवारी शरीफ की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानी जाती हैं. कंधों पर सजी पालकी, पुष्प वर्षा करते श्रद्धालु, नम आंखों से मां को विदाई देते लोग और जय माता दी के जयघोष के बीच होने वाला विसर्जन हर वर्ष इस पुरानी परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाता है.

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