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प्रदूषित हवा और धूलकण बढ़ा रहे टीबी व अस्थमा का खतरा

फुलवारी शरीफ,
बढ़ते प्रदूषण, धूलकण और खराब होती हवा के बीच श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे माहौल में जहां लोग अस्थमा और फेफड़ों की समस्याओं से जूझ रहे हैं, वहीं टीबी (क्षय रोग) के मामले भी चिंता बढ़ा रहे हैं. विश्व टीबी दिवस के मौके पर एम्स पटना के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग द्वारा आयोजित जागरूकता कार्यक्रम ने लोगों को बीमारी से लड़ने के साथ-साथ जागरूक रहने का संदेश दिया.
कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. दीपेन्द्र कुमार राय ने मरीजों से सीधे संवाद करते हुए कहा कि टीबी एक गंभीर बीमारी जरूर है, लेकिन समय पर जांच और पूरा इलाज कराने से इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि लगातार खांसी, बुखार, वजन घटना और रात में पसीना आना जैसे लक्षण दिखने पर तुरंत जांच करानी चाहिए.
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि टीबी का इलाज कम से कम 6 महीने तक नियमित रूप से करना जरूरी है. बीच में दवा छोड़ने से बीमारी जटिल हो सकती है और ड्रग रेसिस्टेंट टीबी का खतरा बढ़ जाता है. मरीजों को यह भरोसा दिलाया गया कि सरकार द्वारा टीबी का इलाज पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध है और निक्षय पोषण योजना के तहत हर मरीज को प्रति माह ₹500 की सहायता भी दी जाती है.
कार्यक्रम की खास बात रही मरीजों और उनके परिजनों के साथ सीधा संवाद, जिसमें उन्होंने अपने सवाल पूछे और विशेषज्ञों से समाधान प्राप्त किया. इससे मरीजों के मन में डर कम हुआ और विश्वास बढ़ा. साथ ही मास्क का उपयोग, खांसते समय मुंह ढकना और हवादार वातावरण में रहने जैसे बचाव के उपायों को सरल तरीके से समझाया गया.
कार्यक्रम के दौरान सभी ने “टीबी हारेगा, देश जीतेगा” का संकल्प लिया, जो एक स्वस्थ समाज की दिशा में सामूहिक प्रयास का प्रतीक बना.
लोगों से अपील करते हुए कहा कि
प्रदूषित हवा और धूल से बचाव के लिए मास्क का प्रयोग करें, भीड़भाड़ और बंद जगहों में सावधानी बरतें. लगातार खांसी या सांस की दिक्कत होने पर तुरंत जांच कराएं और इलाज में लापरवाही न करें.

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